तुम नहीं तो कुछ भी नहीं है ज़िंदगी बाकी
गर रह गया तो पेच-ओ-ख़म-ए-ज़िंदगी बाकी
बेवफा हो सितमगर हो हो ज़फा पेशा भी तुम
चले आवो कुछ और है गर्दिशे-ए-ज़िंदगी बाकी
सबक लो या बंदगी लो मेरे हिस्से के अक्श पे
चलो छोड़ देते हैं कहने को रूदाद-ए-ज़िदगी बाकी
शोर कर ख़मोश यूं मत बैठ जाना मेरी जान
अभी तो तेरे शहर में मेरी और ज़िंदगी बाकी
मुतमइन न हो की चला जायेगा जीव छोड़कर
अभी कुछ और रस्म-ओ-रिवाज़-ए-ज़िंदगी बाकी
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