Skip to main content

Posts

Showing posts from 2015

लँगड़ा परिंदा,

लँगड़ा परिंदा, छज्जे पर आता जाता है आँखो मे ले सूनापन, आसमान को तकता है। एक घोसला प्यारा सा, दुबक के जिसमे रहता है चावल के कुछ दाने देख, छज्जे पर उड़ आता है। बोझल उसके पैर, तनिक नहीं वो चलता है कूद-कूद कर लँगड़ा परिंदा, दाना चुंगता रहता है। कभी-कभी वो ऐसे भी, छज्जे पर आ जाता है तो कभी-कभी वो ऐसे ही, आसमान तक उड़ जाता है। बादल से करके बात ढेर सा, फिर छज्जे पर आ जाता है वो लँगड़ा परिंदा, जीवन के कुछ पाठ नया बतलाता  है।....जीव

दीदी

आज सर्द मौसम बस ऐसे ही  चली आई है ...... दिपावली के सारे दीप बुझ गये हैं ‘’ और ” हवाऐं साफ हो आई हैं ..... सब कुछ वैसा ही है  “ बस ” मौसम मे ठंड आगई है ..... दीदी के स्कूल बैग को देखा, लेकिन वो भी खाली - खाली है ..... उसमे ऊन का ना वो गोला है ना ही वो दो सलाई है फिर जाने क्यू ? आज सर्द मौसम बस ऐसे ही  चली आई है ...... क्या दीदी को नही मालूम ?  की  ठंड बहुत चढ़ आई है या फिर इस ठंड को नही मालूम   कि  दीदी ऊन नही लाई है ……....... जीव

उम्मिद

कुछ उम्मिदों का कारवाँ लिये, जो जहाँ जीतने आया था। दुनियाँ के नये परपंचो पे, जो नया संवाद रचने आया था। बंजर सी धूमिल ह्रिदय पे, जो फसल उगाने आया था। भुजावों में  सहस्रों  का बल  लिये,  जो सहस्रबाहु  बनकर आया  था।                उस जीव का  हौसला अब  तूटता है जो कृष्ण के नीति बाचने आया था, जो जहाँ मे बुद्ध की रीत जगाने आया था, जो गाँधी के विचारों पे नया संर्घस लिखने आया था वो उम्मिदों का कारवाँ लिये, जो जहाँ जीतने आया था। .............जीव

बिधवा

                                                मेरे हिस्से में जो पायल आयी मेरे हिस्से में जो बिछुआ आयी वो सब के सब बेराग निकले...... इक ख़्वाब लिये घर से निकली, अपने लिये खुशी का सामान लिये निकले पर उन्हें भी देखा की वो बड़े ख़फ़िफ़ निकले.... . माँग मे सिन्दूर जिस सुहाग के लिये रचाई, महावर लिये जिस देहलीज पे कदम थी बढ़ाई वो भी सुहाग संग चीता पे सजने के लिये निकले...... कुछ ऐसी थी मेरी कहनी, कुछ ऐसी थी मेरी जवानी जिसपे न अब कोई सुख़न निकले........                                                                ....जीव

तिरे ख़ातिर

कितने रोज़े कितने बरस गुजरें तुम बिन ये तुम क्या जानो... तुम नहीं हो   फिर भी दिल बहजत है तुम बिन ये तुम क्या जानो... कुछ बेचैनियाँ कुछ करार है दिल में तुम बिन ये तुम क्या जानो... कोई वहशत है दिल में तुम बिन ये तुम क्या जानो... कई सवालों के सैलाब दिल मे है तुम बिन ये तुम क्या जानो... यह जीव जिंदा हैं दयर-ओ-हरम में तुम बिन ये तुम क्या जानो...                                                                                                                                    ...जीव

प्यार......!

आज यह सोच कर तेरे श़हर को आया था कि तुम पहले से कहीं ज़ियादा बदल गई होगी, शायद मेरे जज़बात मे बहनें के काबिल हो गई होगी या फिर अपना रकीब समझ मानने लगी होगी लेकिन ये सब महज़ एक भरम था                                 ....... जीव

तुम ईश्वर हो......?

सुना है , कि तुम ईश्वर हो ...... लेकिन जब , लोग को सड़को पे ठिठुरते देखा , आँसू लिये सड़को पे भीख माँगते देखा तो तुम पर यकीन नही होता ....... सुना है , कि तुम ईश्वर हो ....... लेकिन जब , लोगो को पूर्व जन्मों की सजा पाते सुना , स्विकारते हुए हर दुःख को सहते देखा तो तुम पर यकीन नही होता ....... सुना है , कि तुम ईश्वर हो ...... आखिर कैसी ये तुम्हारी निर्लज्जता है कि जो हर दिन , अपना जीवन तुम्हारे नाम से शुरू करता है हर रात तुम्हारे नाम पे खत्म करता है उसको क्यू हार बार रोते हुए देखा है। तो बस यह वज़ह काफी है “ कि ” तुम पर यकीन क्यूं नही होता? सुना है , कि तुम ईश्वर हो ........ जीव

ज्ञान

                       इक ज़ुबा - ए - उफ़्तादगी ( नम्रता , विनम्रता ) लेके चला था फिर जाने क्यूं ज़ुबा - ए - अग्यार ( गैर का बहुवचन ) हो गया ? मोहब्बत की चाह लिए जिन शहर - ओ - ज़हाँ मे फ़िरा  था न जाने क्यूं उन शहर - ओ - ज़हा मे फ़साद हो गया ? वो थी जिनकी राह वो  उस राह पे न चले थे फिर जाने क्यूं वो राह उनका तलबगार हो गया ? कत्ल करना न ईशा ने सिखाया था न मुसा ने कहा था फिर जाने क्यूं भरी बाज़र मे कत्ल-ए-इन्शान हो गये ? ........ जीव