लँगड़ा परिंदा,
छज्जे पर आता जाता है
आँखो मे ले सूनापन,
आसमान को तकता है।
एक घोसला प्यारा सा,
दुबक के जिसमे रहता है
चावल के कुछ दाने देख,
छज्जे पर उड़ आता है।
बोझल उसके पैर,
तनिक नहीं वो चलता है
कूद-कूद कर लँगड़ा परिंदा,
दाना चुंगता रहता है।
कभी-कभी वो ऐसे भी,
छज्जे पर आ जाता है
तो कभी-कभी वो ऐसे ही,
आसमान तक उड़ जाता है।
बादल से करके बात ढेर सा,
फिर छज्जे पर आ जाता है
वो लँगड़ा परिंदा,
जीवन के कुछ पाठ नया बतलाता है।....जीव
जीवन के कुछ पाठ नया बतलाता है।....जीव

achi he
ReplyDeleteआभार दादा.....
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