मैं एक पहाड़ी नदी हूँ
पहाड़ो से उतर पठारों पे चलती हूँ
कभी शांत तो कभी बादल की शोर में होती हूँ
अपने ही पैरों मे थकन ले जमी तृप्त करती हूँ
मैं एक पहाड़ी नदी हूँ
पहाड़ो से उतर पठारों पे चलती हूँ
कभी गृष्म में तपती हूँ कभी हेमन्त में कांपती हूँ
पानी की ढेर लेकर कभी जलपल्वित भी होती हूँ
मैं एक पहाड़ी नदी हूँ
मैं एक पहाड़ी नदी हूँ
पहाड़ो से उतर पठारों पे चलती हूँ
कहीं गाँव बसाती हूँ कहीं जंगल उगाती हूँ
दूर-देश चलकर नई सभ्यता जनती हूँ
मैं एक पहाड़ी नदी हूँ
पहाड़ो से उतर पठारों पे चलती हूँ
......जीव

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