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पहाड़ी नदी

  




मैं एक पहाड़ी नदी हूँ   
पहाड़ो से उतर पठारों पे चलती हूँ
                 कभी शांत तो कभी बादल की शोर में होती हूँ
                 अपने ही पैरों मे थकन ले जमी तृप्त करती हूँ
                     
मैं एक पहाड़ी नदी हूँ
पहाड़ो से उतर पठारों पे चलती हूँ
               कभी गृष्म में तपती हूँ कभी हेमन्त में कांपती हूँ 
               पानी की ढेर लेकर कभी जलपल्वित भी होती हूँ

मैं एक पहाड़ी नदी हूँ
पहाड़ो से उतर पठारों पे चलती हूँ
               कहीं गाँव बसाती हूँ कहीं जंगल उगाती हूँ 
               दूर-देश चलकर नई सभ्यता जनती हूँ
                    
मैं एक पहाड़ी नदी हूँ
पहाड़ो से उतर पठारों पे चलती हूँ
                                                  
                                                ......जीव

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                                                मेरे हिस्से में जो पायल आयी मेरे हिस्से में जो बिछुआ आयी वो सब के सब बेराग निकले...... इक ख़्वाब लिये घर से निकली, अपने लिये खुशी का सामान लिये निकले पर उन्हें भी देखा की वो बड़े ख़फ़िफ़ निकले.... . माँग मे सिन्दूर जिस सुहाग के लिये रचाई, महावर लिये जिस देहलीज पे कदम थी बढ़ाई वो भी सुहाग संग चीता पे सजने के लिये निकले...... कुछ ऐसी थी मेरी कहनी, कुछ ऐसी थी मेरी जवानी जिसपे न अब कोई सुख़न निकले........                                                                ....जीव

वज़ूद

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