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Showing posts from October, 2018

शहर में दंगा कर दे

फिर चलो शहर में हंगमा कर दे फिर कोई रूह लायें उसे जिन्दा कर दे येही तो शौक है शहर के येही तो है मिज़ाज शियसत के चलो उठो फिर शहर में दंगा कर दे वो कौन हैं जिन्हें इन्शान का दर्जा दे वो लाश सी पड़ी जिन्दगी उसे शिज्दा दे वो कामगर जो वहाँ बैठा है                                वो चने वाला जो वहाँ सोया है चलो उठाओं मशाल सब धुआ-धुआ कर दें

शहर

मैं जाऊँ तो कहाँ जाऊँ इस वीरान से शहर से कोई मिलता नहीं ईमान का इस शहर से मैं वो जीव हूँ इस शहर का ये सिर्फ मैं जानता हूँ, यहाँ बदहवाली पनपती है पुरपेच से गलियारे यहाँ बू मारती है किस-किस को रूदाद-ए-शहर बयां करू “ यहाँ ” हर किसी में अब सड़धं की बू मारती है