एक नीम का पेड़.... जिसके नीचे मेरा बचपन खेला था, जिसके नीचे मैंने पहली बार बोला था, जिसके नीचे मैं पहली बार चला था, जो मेरे सुख दुःख का दर्पण था, वो अब मेरे घर के सामने नहीं..... क्योकि वो निर्लज्ज पेड़, सबके घर की शोभा बीगाड़ती थी जीव
बस यूं ही,..... कुछ खास नहीं बस यूं ही.... सुखद एहसास नहीं बस यूं ही... दिल की भड़ास नहीं बस यूं ही... कोई खास आवाज़ नहीं बस यूं ही... तेरे प्यार की किताब नहीं बस यूं ही... मैं तेरे पास नहीं बस यूं ही... कुछ बवाल नहीं बस यूं ही... जगती हुई कोई रात नहीं बस यूं ही......कहानियों की इतिहास नहीं बस यूं ही... कविताओं की प्यार नहीं बस यूं ही.... तेरे सवालों की जवाब नहीं बस यूं ही.... खैर छोड़ो ये दिल की दुकान नहीं बस यूं ही......