Skip to main content

Posts

Showing posts from December, 2019

ढलती उम्र और ढलती शाम

ढलती उम्र और ढलती शाम दोनो की अपनी पीणा है दोनो को लेकर ज़ेहनी तौर पर इनसान उदास रहता है वह घूरता वह चीखता एक गुजरे हुए लम्हे पर उसे बस याद नहीं रहता की सुंकू की शब से निकलता एक दिन का तिफ़्ल है

मै मर रहा हूँ

क्यूं ऐसा लगता है की कैंसर से मर रहा हूँ ? ठिक वैसे ही जैसे, टेबल के छोर पर पड़ा सिगरेट मेरा मर रहा हो कुछ कहने को कुछ नहीं क्योकी खांसते फेफड़े और चिखती आत्मा शेष कुछ नहीं छोड़ती सो गुंजलक की गहराई मे मिरा जख़्म चीसता हुआ मुझे असहाय करता है, पर यह सौभाग्य मेरा की धीरे-धीरे मार रहा हूँ ठिक वैसे ही जैसे टेबल के छोर पर पड़ा हुआ मेरा सिगरेट मर रहा हो          

वह अविनाशी है !

जो अगाध प्रेम की प्रतिमूरत है, उसको कहते माँ हैं। उसने प्रथम स्पर्श किया तब, जब मैं केवल एक भ्रूण मात्र था। आज पृथ्वी पर जन्म लिया,   मानवता का भेष धरा तब जाकर उसने कई रात जगी कर   माँ का एक-एक धर्मा किया पूरा।                              जिसका ऋणी हुआ है मानव, उसको कहते माँ हैं। इक ऋण अदा हो जाये तो परम पूरुष तुम कहलाओ धर्म तुम्हारा भी है रात जगो बेटे का धर्म करो पूरा। जिसके ऋणी हुए हो तुम,   उस माँ पर बलि-बलि तुम जाओ। देखो आंचल इधर उधर जो बिखरा-बिखरा है, उसको हाथ समेटो माँ को पलको तक लाओ उससे प्रेम अगाध करो। जो अजर-अमर है  जिसका केवल शरीर मरेगा, उसको कहते माँ है