ढलती उम्र और ढलती शाम दोनो की अपनी पीणा है दोनो को लेकर ज़ेहनी तौर पर इनसान उदास रहता है वह घूरता वह चीखता एक गुजरे हुए लम्हे पर उसे बस याद नहीं रहता की सुंकू की शब से निकलता एक दिन का तिफ़्ल है
बस यूं ही,..... कुछ खास नहीं बस यूं ही.... सुखद एहसास नहीं बस यूं ही... दिल की भड़ास नहीं बस यूं ही... कोई खास आवाज़ नहीं बस यूं ही... तेरे प्यार की किताब नहीं बस यूं ही... मैं तेरे पास नहीं बस यूं ही... कुछ बवाल नहीं बस यूं ही... जगती हुई कोई रात नहीं बस यूं ही......कहानियों की इतिहास नहीं बस यूं ही... कविताओं की प्यार नहीं बस यूं ही.... तेरे सवालों की जवाब नहीं बस यूं ही.... खैर छोड़ो ये दिल की दुकान नहीं बस यूं ही......