क्यूं ऐसा लगता है की कैंसर से मर रहा हूँ?
ठिक वैसे ही
जैसे, टेबल के छोर पर पड़ा सिगरेट मेरा मर रहा हो
कुछ कहने को कुछ नहीं
क्योकी खांसते फेफड़े और चिखती आत्मा शेष कुछ नहीं छोड़ती
सो गुंजलक की गहराई मे मिरा जख़्म चीसता हुआ
मुझे असहाय करता है,
पर यह सौभाग्य मेरा की धीरे-धीरे मार रहा हूँ
ठिक वैसे ही
जैसे टेबल के छोर पर पड़ा हुआ मेरा सिगरेट मर रहा हो
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