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ढलती उम्र और ढलती शाम



ढलती उम्र और ढलती शाम दोनो की अपनी पीणा है
दोनो को लेकर ज़ेहनी तौर पर इनसान उदास रहता है
वह घूरता वह चीखता एक गुजरे हुए लम्हे पर
उसे बस याद नहीं रहता
की सुंकू की शब से निकलता एक दिन का तिफ़्ल है

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