मेरे हिस्से में जो पायल आयी मेरे हिस्से में जो बिछुआ आयी वो सब के सब बेराग निकले...... इक ख़्वाब लिये घर से निकली, अपने लिये खुशी का सामान लिये निकले पर उन्हें भी देखा की वो बड़े ख़फ़िफ़ निकले.... . माँग मे सिन्दूर जिस सुहाग के लिये रचाई, महावर लिये जिस देहलीज पे कदम थी बढ़ाई वो भी सुहाग संग चीता पे सजने के लिये निकले...... कुछ ऐसी थी मेरी कहनी, कुछ ऐसी थी मेरी जवानी जिसपे न अब कोई सुख़न निकले........ ....जीव
बस यूं ही,..... कुछ खास नहीं बस यूं ही.... सुखद एहसास नहीं बस यूं ही... दिल की भड़ास नहीं बस यूं ही... कोई खास आवाज़ नहीं बस यूं ही... तेरे प्यार की किताब नहीं बस यूं ही... मैं तेरे पास नहीं बस यूं ही... कुछ बवाल नहीं बस यूं ही... जगती हुई कोई रात नहीं बस यूं ही......कहानियों की इतिहास नहीं बस यूं ही... कविताओं की प्यार नहीं बस यूं ही.... तेरे सवालों की जवाब नहीं बस यूं ही.... खैर छोड़ो ये दिल की दुकान नहीं बस यूं ही......