तुम कहो तो कुछ कह दें या फिर यूं ही रहने दें तुम ज़न हो तुम स्त्री हो तुम सब जानती हो तुम से ब्रह्मान्ड है तुम से ही जीवन का मूल है तुम नारत्व की परिभाषा हो अरे तुम तो मनोभाव भी पढ़ती हो फिर क्यूं लफ़्जों की ये डर तुम में हो आओ कह दें, ख़ामोशियों को तोड़ दें दर्द जो भी हो धूप की चादर में ओढ़ लें और फिर कह दें स्त्री तेरी जिंन्दाबाद हो....
बस यूं ही,..... कुछ खास नहीं बस यूं ही.... सुखद एहसास नहीं बस यूं ही... दिल की भड़ास नहीं बस यूं ही... कोई खास आवाज़ नहीं बस यूं ही... तेरे प्यार की किताब नहीं बस यूं ही... मैं तेरे पास नहीं बस यूं ही... कुछ बवाल नहीं बस यूं ही... जगती हुई कोई रात नहीं बस यूं ही......कहानियों की इतिहास नहीं बस यूं ही... कविताओं की प्यार नहीं बस यूं ही.... तेरे सवालों की जवाब नहीं बस यूं ही.... खैर छोड़ो ये दिल की दुकान नहीं बस यूं ही......