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स्त्री तेरी जिंन्दाबाद हो...

तुम कहो तो कुछ कह दें

या फिर यूं ही रहने दें

तुम ज़न हो तुम स्त्री हो

तुम सब जानती हो

तुम से ब्रह्मान्ड है

तुम से ही जीवन का मूल है 

तुम नारत्व की परिभाषा हो  

अरे तुम तो मनोभाव भी पढ़ती हो

फिर क्यूं लफ़्जों की ये डर तुम में हो

आओ कह दें,

ख़ामोशियों को तोड़ दें

दर्द जो भी हो

धूप की चादर में ओढ़ लें

और फिर कह दें 

स्त्री तेरी जिंन्दाबाद हो....

 


 


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