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Showing posts from May, 2014

झूठी तस्सली

याद है हमको पापा का, सुबह-सुबह वो दफ़्तर जाना दोड़ के जाके उनसे कहना पापा  लौट के लाना एक पंतग मैं भी खुब उड़ाऊगां चिंटु,मिंटु,पिंटु को खेल में छकाऊंगा और सबसे उपर आसमान तक अपना पंतग उड़ाऊगां शाम ढले जब  पापा  आते दौड़ के पानी हम दे आते और ढूंढते अपना पंतग हार के उनसे पूछ ही लेते  क्या भूल गये फिर लाना पंतग ?  पापा   का वो ना कह देना आँखो से  फिर  नीर बहाना फिर   अम्मी की वो झूठी तस्सली कितनी मीठी लगती थी। .....जीव

गुन

दिन सबके संग बाँटते फिरते हो, फ़कीरों की तरह। पर ये रात तुम्हारी है, इसे यूँ ऩ बयाँ कर शिकायत करो। कभी लगे ये खालीपन तकलीफ़ज़दा है, तो फ़कीरों को हर रात दो रोटीयाँ खीलाया करो।.....जीव

घर की दुलहन

रात ये जब सो जाती है राह बहुत थक जाती है गाँव के पीछे जंगल मे आकर जब सीयार हुंआई लेता है तब घर की  दुलहन  चौखट पर आकर प्रीतम के आने की उम्मिद जगाती है। लल्ला जब ख़्वाब लिये सो जाता है सास-ससुर की आहट भी आँख तले थक जाती है छत के उपर आसमान में आकर जब चँदा आँख लड़ाता है तब घर की  दुलहन  चौखट  पर आकर प्रीतम  के आने की उम्मिद जगाती है। दर्पण ये जब सो जाती है बिस्तर अंगड़ाई खा-खा कर थक जाती है भाभी-भाभी कहकर जब कोई दिल्लगी कर जाता है तब घर की दुलहन चौखट पर आकर प्रीतम  के आने की उम्मिद जगाती है। सिन्दुर ये जब सो जाती है चूड़ी की खन-खन भी जब हाथ में थक जाती है जब दूजा ब्याह रचाने को सास-ससुर समझाते आकर और फिर,ऐसे में रिस्ते की बात कोई नया कर जाता है तब घर की  दुलहन    चौखट पर आकर प्रीतम  के आने की उम्मिद जगाती है।......जीव

मलेक्क्ष की लड़की

(सआदत हसन मंटो की लघु कथा "बू" से प्रेरित) एक बू थी उसके यवन में पर वो महक थी मेंरे हवस में जिसको सबने कहा था मलेक्क्ष की लड़की पर वो थी..... अल्हण,मदमस्त जवानी की लड़की जिसको जिया था हवस के चादर में जिसको पिया था वासना के प्याले में जो पुरी रात थी..... अल्हण,मदमस्त जवानी की लड़की जिसकी बू में महका था मन् और मैं  जो अब कहीं नही दिखती  जिसके अंगों के मधुपान से तृप्त हुआ था मैं . ....जीव