याद है हमको पापा का,
सुबह-सुबह वो दफ़्तर जाना
दोड़ के जाके उनसे कहना
पापा लौट के लाना एक पंतग
मैं भी खुब उड़ाऊगां
चिंटु,मिंटु,पिंटु को खेल में छकाऊंगा
और सबसे उपर आसमान तक
अपना पंतग उड़ाऊगां
शाम ढले जब पापा आते
दौड़ के पानी हम दे आते
और ढूंढते अपना पंतग
हार के उनसे पूछ ही लेते
क्या भूल गये फिर लाना पंतग?
पापा का वो ना कह देना
आँखो से फिर नीर बहाना
फिर अम्मी की वो झूठी तस्सली
कितनी मीठी लगती थी।.....जीव
Comments
Post a Comment