काका हाथरसी के दाढ़ी महिमा से प्रेरित..... दाढ़ी बढ़ाओ दाढ़ी बढ़ाओ मिल कर दो ऐसा शोर, दुनिया के ये दाढ़ी रहित पाये नही कहिं पर ठौर सड़को पर निकलो लेकर दाढ़ी की यह मूहिम, यह ज्वलंत विषया है,इस पर भी जलनी है सत्याग्रह की लौ आओ घर से बाहर आओ भारत के ऐ जन, दाढ़ी का गुणगान करो यह दढ़ी है भारत का सिरमौर....जीव
बस यूं ही,..... कुछ खास नहीं बस यूं ही.... सुखद एहसास नहीं बस यूं ही... दिल की भड़ास नहीं बस यूं ही... कोई खास आवाज़ नहीं बस यूं ही... तेरे प्यार की किताब नहीं बस यूं ही... मैं तेरे पास नहीं बस यूं ही... कुछ बवाल नहीं बस यूं ही... जगती हुई कोई रात नहीं बस यूं ही......कहानियों की इतिहास नहीं बस यूं ही... कविताओं की प्यार नहीं बस यूं ही.... तेरे सवालों की जवाब नहीं बस यूं ही.... खैर छोड़ो ये दिल की दुकान नहीं बस यूं ही......