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Showing posts from 2020

मेरा वतन...

(मंटो की काली सलवार से) मुद्दतों बीत गये कहते कहते ले चलो  अम्बाला की गलियों में, जहाँ सरमाया कमाते थे रोज़ ब रोज़।  ये दिल्ली भी खाक़ की दिल्ली है, तुमने जिसके ख़्वाब दिखाये थे यहाँ जिस्म के धन्धे में, रोज़ ब रोज़ हम  तीन कमाते हैं वहाँ तो एक पर तीस बनाते थे । ऐ खुदाबख़्श बीत गया कहते कहते मुझे ले चलो फिर अम्बाला की गलियों मे, जहाँ सरमाया कमाते थे रोज़ ब रोज़। 

खु़शी

रोशन हुआ शब जो तुम आये उम्म्दि-ए-इश्क जो तुम लाये। दिल ये मिरा बच्चा हुआ जाता   अच्छा है की खिलौना तुम लाये। दिल दुखता उसके जाने के पर     अच्छा है की मरहम तुम लाये। शाम हो गई वो  अपने  घर  चले  अल्लाह करम,की जुगनू  तुम लाये। उदाशियाँ बाँधता “ जीव ” उसके जाने पर चलो खु़शी का एक पल तो तुम लाये।                

फ़स्ल-ए-गुल

ज़ुरअत-ओ-ग़ैरत से मिरा तब - ओ-ताब(1) है शहर-ए-दिल्ली में NRC का इन्क़लाब है चुप रहती है सरकारें इन्फ़िकाक(2) बातों पर  गंगा जमुनी तहजीब में आखिर क्यूं अन्साब (3)  है शहर बदनाम न हो गर हिन्दुं मुस्लमान न हो मना लो होली-ईंद इसबार ये नया आफ़ताब है क्यू नहीं समझती सरकारें हालत-ए-मुल्क को   ख़सो-ख़ाशाक(4) पे मुल्क़ की अभी आब-ओ-ताब(5) है शहरे-ए-दिल्ली में “ जीव ” नया नज़राना लाया फ़स्ल-ए-गुल(6) में चलता अब ये नया कारोबार है 1-कोल्हाल युक्त चकाचौंध, 2-अलगाव,3- जातियाँ 4-घास फूस, 5-चमक दमक,6-बंसत को मौसम

तेरे प्यार में

ख़ुदा करे की कोई इत्तेफाक हो जाये तेरे प्यार में इक बर खाक हो जाये कोई इश्तिहार लगा दो शहर में उनके अरे कोई तो उनका सरबराह1 हो जाये सहर2 पढ़ दो मेरे ख़ातिर कोई उलेमा3 वो प्यार में मेरे यूंही तबाह हो जाये रहूं जिधर भी रहूं मेरे घर में वो रहे चाहे जिग़र कितना ही चाक4 हो जाये   कत़्ल हो जाये गर “ जीव ” का तेरी गली मे   तो मूह छुपा लेना की तूँ पाक हो जाये 1-Agent,2-Magic,3-Scholar of Islam and 4-Slit/Torn & Cut 

नया ईंमान

जल गया सब कुछ ख़ाक हो गया आँखों में आँसू तमाम हो गया। तलवारें नग्न हो गईं बदुंखें आग थूक दीं देखते देखते कूंचा-ए-शहर शमशान हो गया।    उतर गई इंसानियत की कमीज़ दिल-ए-दिल्ली अब दंगे में सबका नया ईंमान हो गया। ठहर गये सब अपने अपने घर गये सब कुछ रह गया तो बस आँखो में मलाल रह गया। ये किस की नज़र लग गई जीव बदनाम हो गया   देख लो अब सियासत का नया रुआब रह गया । 

ज़िंदगी बाकी

तुम नहीं तो कुछ भी नहीं है ज़िंदगी बाकी गर रह गया तो पेच-ओ-ख़म-ए-ज़िंदगी बाकी बेवफा हो सितमगर हो हो ज़फा पेशा भी तुम चले आवो कुछ और है गर्दिशे-ए-ज़िंदगी बाकी सबक लो या बंदगी लो मेरे हिस्से के अक्श पे चलो छोड़ देते हैं कहने को रूदाद-ए-ज़िदगी बाकी शोर कर ख़मोश यूं मत बैठ जाना मेरी जान अभी तो तेरे शहर में मेरी और ज़िंदगी बाकी मुतमइन न हो की चला जायेगा जीव छोड़कर अभी कुछ और रस्म-ओ-रिवाज़-ए-ज़िंदगी बाकी                      

होली आई

बसंत की मुस्कान आई सुमन की कलियां खिल आई खेतों में हरियाली छाई तो चलो बाहर निकलो खेलने होली आई रंग उमंगो की बादल पर छाई राहों पे गुलाल की परछाईं सब रंगों से महक गये हैं तो चलो बाहर निकलो खेलने होली आई भांग-धतुरे सब मौसम में घुल आईं गुलगुले गुझिये ने घर महकाई सब पर रंगों की होली चढ़ आई तो चलो बाहर निकलो खेलने होली आई मन के भेद मिटाती होली आई चहचहाति गीतों को गाती आंगन में गौरैया आई नखरीली बल खाती खेतों में भी सरसो   आई तो चलो बाहर निकलो खेलने होली आई          

काश ! कोई पंख होता

काश ! कोई पंख होता, जो मेरी कल्पनाओं को लेकर उड़ता जिसे ले आसमा तक जाता, उससे बातें करता रूदाद अपनी सुनाता कहता सुनता अनगितनत बातें करता       इस अम्बर से उस अम्बर तक उड़ता       काश ! कोई पंख होता,