(मंटो की काली सलवार से) मुद्दतों बीत गये कहते कहते ले चलो अम्बाला की गलियों में, जहाँ सरमाया कमाते थे रोज़ ब रोज़। ये दिल्ली भी खाक़ की दिल्ली है, तुमने जिसके ख़्वाब दिखाये थे यहाँ जिस्म के धन्धे में, रोज़ ब रोज़ हम तीन कमाते हैं वहाँ तो एक पर तीस बनाते थे । ऐ खुदाबख़्श बीत गया कहते कहते मुझे ले चलो फिर अम्बाला की गलियों मे, जहाँ सरमाया कमाते थे रोज़ ब रोज़।
बस यूं ही,..... कुछ खास नहीं बस यूं ही.... सुखद एहसास नहीं बस यूं ही... दिल की भड़ास नहीं बस यूं ही... कोई खास आवाज़ नहीं बस यूं ही... तेरे प्यार की किताब नहीं बस यूं ही... मैं तेरे पास नहीं बस यूं ही... कुछ बवाल नहीं बस यूं ही... जगती हुई कोई रात नहीं बस यूं ही......कहानियों की इतिहास नहीं बस यूं ही... कविताओं की प्यार नहीं बस यूं ही.... तेरे सवालों की जवाब नहीं बस यूं ही.... खैर छोड़ो ये दिल की दुकान नहीं बस यूं ही......