(मंटो की काली सलवार से)
मुद्दतों बीत गये कहते कहते
ले चलो अम्बाला की
गलियों में,
जहाँ सरमाया कमाते थे रोज़ ब रोज़।
ये दिल्ली भी खाक़ की दिल्ली है,
तुमने जिसके ख़्वाब दिखाये थे
यहाँ जिस्म के धन्धे में,
रोज़ ब रोज़ हम तीन कमाते हैं
वहाँ तो एक पर तीस बनाते थे।
ऐ खुदाबख़्श बीत गया कहते
कहते
मुझे ले चलो फिर अम्बाला की
गलियों मे,
जहाँ सरमाया कमाते थे रोज़ ब रोज़।
जहाँ सरमाया कमाते थे रोज़ ब रोज़।
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