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पिता

पिता का होना सुख है पिता का न होना दुःख  शेष इन दोनो के मध्य कुछ है, वही आज स्मृति शेष । पिता अंबर है, पिता समंदर है, पिता धूप में वृक्ष छायादार है। पिता वही है, जिसके आने की राह हम देखते है पिता वही है, जिसके कंधे से दुनिया हम देखते है  पिता राह है, पिता आदर्श है, पिता संसार है  पिता है तो सबकुछ है  पिता नही है,  तो कुछ भी नहीं शेष है।
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मैं

  मैं निःशब्द हूं , मैं निःशब्दता का पर्याय हूं मैं मौन हूं किन्तु मौनत मेरी कायरता नहीं गर! तुम्हे लगता है  की  कमजोर हूँ तो सुनो, मेरे शब्द जब उठेंगे  सवलों पे कई सवल उठेंगे तब तुम्हें मेरे मनुभाओ समझ आयेंगे   पथ पे हारे मजदूर जैसा मनुभाओ जो है  वो  निराला के कलम  जैसा    वही इलाहाबाद के पथ पे बैठे मजदूर  जैसा  वही निरह सबकुछ देने वाला भिछुक  जैसा  मैं कृष्ण नहीं बलराम हूं मैं भार्गव नहीं मैं राम हूं मैं हारता मैं जीतता मैं जीव का सार हूं मैं निःशब्द हूं , मैं निःशब्दता का पर्याय हूं                                             जीव

स्त्री तेरी जिंन्दाबाद हो...

तुम कहो तो कुछ कह दें या फिर यूं ही रहने दें तुम ज़न हो तुम स्त्री हो तुम सब जानती हो तुम से ब्रह्मान्ड है तुम से ही जीवन का मूल है  तुम नारत्व की परिभाषा हो   अरे तुम तो मनोभाव भी पढ़ती हो फिर क्यूं लफ़्जों की ये डर तुम में हो आओ कह दें, ख़ामोशियों को तोड़ दें दर्द जो भी हो धूप की चादर में ओढ़ लें और फिर कह दें  स्त्री तेरी जिंन्दाबाद हो....    

मेरा वतन...

(मंटो की काली सलवार से) मुद्दतों बीत गये कहते कहते ले चलो  अम्बाला की गलियों में, जहाँ सरमाया कमाते थे रोज़ ब रोज़।  ये दिल्ली भी खाक़ की दिल्ली है, तुमने जिसके ख़्वाब दिखाये थे यहाँ जिस्म के धन्धे में, रोज़ ब रोज़ हम  तीन कमाते हैं वहाँ तो एक पर तीस बनाते थे । ऐ खुदाबख़्श बीत गया कहते कहते मुझे ले चलो फिर अम्बाला की गलियों मे, जहाँ सरमाया कमाते थे रोज़ ब रोज़। 

खु़शी

रोशन हुआ शब जो तुम आये उम्म्दि-ए-इश्क जो तुम लाये। दिल ये मिरा बच्चा हुआ जाता   अच्छा है की खिलौना तुम लाये। दिल दुखता उसके जाने के पर     अच्छा है की मरहम तुम लाये। शाम हो गई वो  अपने  घर  चले  अल्लाह करम,की जुगनू  तुम लाये। उदाशियाँ बाँधता “ जीव ” उसके जाने पर चलो खु़शी का एक पल तो तुम लाये।                

फ़स्ल-ए-गुल

ज़ुरअत-ओ-ग़ैरत से मिरा तब - ओ-ताब(1) है शहर-ए-दिल्ली में NRC का इन्क़लाब है चुप रहती है सरकारें इन्फ़िकाक(2) बातों पर  गंगा जमुनी तहजीब में आखिर क्यूं अन्साब (3)  है शहर बदनाम न हो गर हिन्दुं मुस्लमान न हो मना लो होली-ईंद इसबार ये नया आफ़ताब है क्यू नहीं समझती सरकारें हालत-ए-मुल्क को   ख़सो-ख़ाशाक(4) पे मुल्क़ की अभी आब-ओ-ताब(5) है शहरे-ए-दिल्ली में “ जीव ” नया नज़राना लाया फ़स्ल-ए-गुल(6) में चलता अब ये नया कारोबार है 1-कोल्हाल युक्त चकाचौंध, 2-अलगाव,3- जातियाँ 4-घास फूस, 5-चमक दमक,6-बंसत को मौसम

तेरे प्यार में

ख़ुदा करे की कोई इत्तेफाक हो जाये तेरे प्यार में इक बर खाक हो जाये कोई इश्तिहार लगा दो शहर में उनके अरे कोई तो उनका सरबराह1 हो जाये सहर2 पढ़ दो मेरे ख़ातिर कोई उलेमा3 वो प्यार में मेरे यूंही तबाह हो जाये रहूं जिधर भी रहूं मेरे घर में वो रहे चाहे जिग़र कितना ही चाक4 हो जाये   कत़्ल हो जाये गर “ जीव ” का तेरी गली मे   तो मूह छुपा लेना की तूँ पाक हो जाये 1-Agent,2-Magic,3-Scholar of Islam and 4-Slit/Torn & Cut