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Showing posts from February, 2015

ज्ञान

                       इक ज़ुबा - ए - उफ़्तादगी ( नम्रता , विनम्रता ) लेके चला था फिर जाने क्यूं ज़ुबा - ए - अग्यार ( गैर का बहुवचन ) हो गया ? मोहब्बत की चाह लिए जिन शहर - ओ - ज़हाँ मे फ़िरा  था न जाने क्यूं उन शहर - ओ - ज़हा मे फ़साद हो गया ? वो थी जिनकी राह वो  उस राह पे न चले थे फिर जाने क्यूं वो राह उनका तलबगार हो गया ? कत्ल करना न ईशा ने सिखाया था न मुसा ने कहा था फिर जाने क्यूं भरी बाज़र मे कत्ल-ए-इन्शान हो गये ? ........ जीव