इक ज़ुबा - ए - उफ़्तादगी ( नम्रता , विनम्रता ) लेके चला था फिर जाने क्यूं ज़ुबा - ए - अग्यार ( गैर का बहुवचन ) हो गया ? मोहब्बत की चाह लिए जिन शहर - ओ - ज़हाँ मे फ़िरा था न जाने क्यूं उन शहर - ओ - ज़हा मे फ़साद हो गया ? वो थी जिनकी राह वो उस राह पे न चले थे फिर जाने क्यूं वो राह उनका तलबगार हो गया ? कत्ल करना न ईशा ने सिखाया था न मुसा ने कहा था फिर जाने क्यूं भरी बाज़र मे कत्ल-ए-इन्शान हो गये ? ........ जीव
बस यूं ही,..... कुछ खास नहीं बस यूं ही.... सुखद एहसास नहीं बस यूं ही... दिल की भड़ास नहीं बस यूं ही... कोई खास आवाज़ नहीं बस यूं ही... तेरे प्यार की किताब नहीं बस यूं ही... मैं तेरे पास नहीं बस यूं ही... कुछ बवाल नहीं बस यूं ही... जगती हुई कोई रात नहीं बस यूं ही......कहानियों की इतिहास नहीं बस यूं ही... कविताओं की प्यार नहीं बस यूं ही.... तेरे सवालों की जवाब नहीं बस यूं ही.... खैर छोड़ो ये दिल की दुकान नहीं बस यूं ही......