Skip to main content

ज्ञान

           

          

इक ज़ुबा--उफ़्तादगी(नम्रता,विनम्रता) लेके चला था

फिर जाने क्यूं ज़ुबा--अग्यार(गैर का बहुवचन) हो गया ?

मोहब्बत की चाह लिए जिन शहर--ज़हाँ मे फ़िरा  था

न जाने क्यूं उन शहर--ज़हा मे फ़साद हो गया?

वो थी जिनकी राह वो  उस राह पे न चले थे

फिर जाने क्यूं वो राह उनका तलबगार हो गया?

कत्ल करना न ईशा ने सिखाया था न मुसा ने कहा था


फिर जाने क्यूं भरी बाज़र मे कत्ल-ए-इन्शान हो गये?........जीव

Comments

Popular posts from this blog

पहाड़ी नदी

   मैं एक पहाड़ी नदी हूँ    पहाड़ो से उतर पठारों पे चलती हूँ                  कभी शांत तो कभी बादल की शोर में होती हूँ                  अपने ही पैरों मे थकन ले जमी तृप्त करती हूँ                       मैं एक पहाड़ी नदी हूँ पहाड़ो से उतर पठारों पे चलती हूँ                कभी गृष्म में तपती हूँ  कभी हेमन्त में कांपती हूँ                 पानी की ढेर लेकर  कभी   जलपल्वित भी होती  हूँ मैं एक पहाड़ी नदी हूँ पहाड़ो से उतर पठारों पे चलती हूँ                कहीं गाँव बसाती हूँ  कहीं जंगल उगाती हूँ                 दूर-देश चलकर नई सभ...

बिधवा

                                                मेरे हिस्से में जो पायल आयी मेरे हिस्से में जो बिछुआ आयी वो सब के सब बेराग निकले...... इक ख़्वाब लिये घर से निकली, अपने लिये खुशी का सामान लिये निकले पर उन्हें भी देखा की वो बड़े ख़फ़िफ़ निकले.... . माँग मे सिन्दूर जिस सुहाग के लिये रचाई, महावर लिये जिस देहलीज पे कदम थी बढ़ाई वो भी सुहाग संग चीता पे सजने के लिये निकले...... कुछ ऐसी थी मेरी कहनी, कुछ ऐसी थी मेरी जवानी जिसपे न अब कोई सुख़न निकले........                                                                ....जीव

वज़ूद

         एक तन्हाई एक शोर पर खड़ा मौज़ू, एक आज़ादी एक गुलामी की शोक, एक ख़्वाईशो की निन्द एक छन्न् करते सपनों के जेब, सबके अपने वज़ूद सबके अपने सबब सच कहता हूँ जीव तुम्हारी यही ज़िन्दगी है। एक चाहत एक अनमना सा दिल, एक रुदाद एक हकीकत, एक आँखो मे छायी उदासी एक मन् में उठी मादक खुशबु, सबके अपने वज़ूद सबके अपने सबब सच कहता हूँ जीव तुम्हारी यही ज़िन्दगी है।                                        .....जीव