इक ज़ुबा-ए-उफ़्तादगी(नम्रता,विनम्रता) लेके चला था
फिर जाने क्यूं ज़ुबा-ए-अग्यार(गैर का बहुवचन) हो गया ?
मोहब्बत की चाह लिए जिन शहर-ओ-ज़हाँ मे फ़िरा था
न जाने क्यूं उन शहर-ओ-ज़हा मे फ़साद हो गया?
वो थी जिनकी राह वो उस राह पे न चले थे
फिर जाने क्यूं वो राह उनका तलबगार हो गया?
कत्ल करना न ईशा ने सिखाया था न मुसा ने कहा था
फिर जाने क्यूं भरी बाज़र मे कत्ल-ए-इन्शान हो
गये?........जीव

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