आखिर क्यूं ? बार-बार जाने किस विषय को कंठस्थ कर रहा था यह समझ से परे था मुझसे और मेरे स्मृतियों से किन्तु फिर भी इसी राग को पिरोने मे लगा था आखरी वो कौन सी हवस थी, जिसको जीव एक बार फिर पाना चाहता था आखिर वो कौन सा प्यार था , जीसमे पतंगे की तरह वो जलना चाहता था आखिर क्यूं ? अपने धर्म को छोड़ दूसरे पथ पे चलना चाहता था......जीव
बस यूं ही,..... कुछ खास नहीं बस यूं ही.... सुखद एहसास नहीं बस यूं ही... दिल की भड़ास नहीं बस यूं ही... कोई खास आवाज़ नहीं बस यूं ही... तेरे प्यार की किताब नहीं बस यूं ही... मैं तेरे पास नहीं बस यूं ही... कुछ बवाल नहीं बस यूं ही... जगती हुई कोई रात नहीं बस यूं ही......कहानियों की इतिहास नहीं बस यूं ही... कविताओं की प्यार नहीं बस यूं ही.... तेरे सवालों की जवाब नहीं बस यूं ही.... खैर छोड़ो ये दिल की दुकान नहीं बस यूं ही......