(सआदत हसन मंटो की लघु कथा "बू" से प्रेरित)
एक बू थी उसके यवन में
पर वो महक थी मेंरे हवस में
जिसको सबने कहा था मलेक्क्ष
की लड़की
पर वो थी.....
अल्हण,मदमस्त जवानी की
लड़की
जिसको जिया था हवस के चादर में
जिसको पिया था वासना के
प्याले में
जो पुरी रात थी.....
अल्हण,मदमस्त जवानी की
लड़की
जिसकी बू में महका था मन् और मैं
जो अब कहीं नही दिखती
जिसके अंगों के मधुपान से तृप्त हुआ था मैं
.....जीव
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