दिन सबके संग बाँटते फिरते हो,
फ़कीरों की तरह।
पर ये रात तुम्हारी है,
इसे यूँ ऩ बयाँ कर शिकायत करो।
कभी लगे ये खालीपन तकलीफ़ज़दा है,
तो फ़कीरों को हर रात दो रोटीयाँ खीलाया करो।.....जीव
बस यूं ही,..... कुछ खास नहीं बस यूं ही.... सुखद एहसास नहीं बस यूं ही... दिल की भड़ास नहीं बस यूं ही... कोई खास आवाज़ नहीं बस यूं ही... तेरे प्यार की किताब नहीं बस यूं ही... मैं तेरे पास नहीं बस यूं ही... कुछ बवाल नहीं बस यूं ही... जगती हुई कोई रात नहीं बस यूं ही......कहानियों की इतिहास नहीं बस यूं ही... कविताओं की प्यार नहीं बस यूं ही.... तेरे सवालों की जवाब नहीं बस यूं ही.... खैर छोड़ो ये दिल की दुकान नहीं बस यूं ही......
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