बात जो मन की रही किस को सुनाता गीत बन झेलम तुम्ही गा के बताना मेरे ह्रदय की संवेदना।। कैसी जली ये अग्नि कुण्ड जो भयावह द्श्य बन लो खा गय सबको यहाँ ज़िहाद की अवचेतना।। अब उठेगा किस किस से ये जो मौत का मलबा पड़ा क़ुरान-शरीफ़ सबको बताना खुदा के ह्रदय की वेदना।। उठो तुम्हीं ज़िहाद करना पर नाम ख़ुदा का छोड़ कर मौत से रिश्ता तुम्हारा तुम्हीं सु नों अब ये क्रन्दना।।
बस यूं ही,..... कुछ खास नहीं बस यूं ही.... सुखद एहसास नहीं बस यूं ही... दिल की भड़ास नहीं बस यूं ही... कोई खास आवाज़ नहीं बस यूं ही... तेरे प्यार की किताब नहीं बस यूं ही... मैं तेरे पास नहीं बस यूं ही... कुछ बवाल नहीं बस यूं ही... जगती हुई कोई रात नहीं बस यूं ही......कहानियों की इतिहास नहीं बस यूं ही... कविताओं की प्यार नहीं बस यूं ही.... तेरे सवालों की जवाब नहीं बस यूं ही.... खैर छोड़ो ये दिल की दुकान नहीं बस यूं ही......