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Showing posts from November, 2015

लँगड़ा परिंदा,

लँगड़ा परिंदा, छज्जे पर आता जाता है आँखो मे ले सूनापन, आसमान को तकता है। एक घोसला प्यारा सा, दुबक के जिसमे रहता है चावल के कुछ दाने देख, छज्जे पर उड़ आता है। बोझल उसके पैर, तनिक नहीं वो चलता है कूद-कूद कर लँगड़ा परिंदा, दाना चुंगता रहता है। कभी-कभी वो ऐसे भी, छज्जे पर आ जाता है तो कभी-कभी वो ऐसे ही, आसमान तक उड़ जाता है। बादल से करके बात ढेर सा, फिर छज्जे पर आ जाता है वो लँगड़ा परिंदा, जीवन के कुछ पाठ नया बतलाता  है।....जीव

दीदी

आज सर्द मौसम बस ऐसे ही  चली आई है ...... दिपावली के सारे दीप बुझ गये हैं ‘’ और ” हवाऐं साफ हो आई हैं ..... सब कुछ वैसा ही है  “ बस ” मौसम मे ठंड आगई है ..... दीदी के स्कूल बैग को देखा, लेकिन वो भी खाली - खाली है ..... उसमे ऊन का ना वो गोला है ना ही वो दो सलाई है फिर जाने क्यू ? आज सर्द मौसम बस ऐसे ही  चली आई है ...... क्या दीदी को नही मालूम ?  की  ठंड बहुत चढ़ आई है या फिर इस ठंड को नही मालूम   कि  दीदी ऊन नही लाई है ……....... जीव

उम्मिद

कुछ उम्मिदों का कारवाँ लिये, जो जहाँ जीतने आया था। दुनियाँ के नये परपंचो पे, जो नया संवाद रचने आया था। बंजर सी धूमिल ह्रिदय पे, जो फसल उगाने आया था। भुजावों में  सहस्रों  का बल  लिये,  जो सहस्रबाहु  बनकर आया  था।                उस जीव का  हौसला अब  तूटता है जो कृष्ण के नीति बाचने आया था, जो जहाँ मे बुद्ध की रीत जगाने आया था, जो गाँधी के विचारों पे नया संर्घस लिखने आया था वो उम्मिदों का कारवाँ लिये, जो जहाँ जीतने आया था। .............जीव