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Showing posts from April, 2020

मेरा वतन...

(मंटो की काली सलवार से) मुद्दतों बीत गये कहते कहते ले चलो  अम्बाला की गलियों में, जहाँ सरमाया कमाते थे रोज़ ब रोज़।  ये दिल्ली भी खाक़ की दिल्ली है, तुमने जिसके ख़्वाब दिखाये थे यहाँ जिस्म के धन्धे में, रोज़ ब रोज़ हम  तीन कमाते हैं वहाँ तो एक पर तीस बनाते थे । ऐ खुदाबख़्श बीत गया कहते कहते मुझे ले चलो फिर अम्बाला की गलियों मे, जहाँ सरमाया कमाते थे रोज़ ब रोज़।