कितने रोज़े कितने बरस गुजरें तुम बिन ये तुम क्या जानो... तुम नहीं हो फिर भी दिल बहजत है तुम बिन ये तुम क्या जानो... कुछ बेचैनियाँ कुछ करार है दिल में तुम बिन ये तुम क्या जानो... कोई वहशत है दिल में तुम बिन ये तुम क्या जानो... कई सवालों के सैलाब दिल मे है तुम बिन ये तुम क्या जानो... यह जीव जिंदा हैं दयर-ओ-हरम में तुम बिन ये तुम क्या जानो... ...जीव
बस यूं ही,..... कुछ खास नहीं बस यूं ही.... सुखद एहसास नहीं बस यूं ही... दिल की भड़ास नहीं बस यूं ही... कोई खास आवाज़ नहीं बस यूं ही... तेरे प्यार की किताब नहीं बस यूं ही... मैं तेरे पास नहीं बस यूं ही... कुछ बवाल नहीं बस यूं ही... जगती हुई कोई रात नहीं बस यूं ही......कहानियों की इतिहास नहीं बस यूं ही... कविताओं की प्यार नहीं बस यूं ही.... तेरे सवालों की जवाब नहीं बस यूं ही.... खैर छोड़ो ये दिल की दुकान नहीं बस यूं ही......