फिर चलो शहर में हंगमा कर दे फिर कोई रूह लायें उसे जिन्दा कर दे येही तो शौक है शहर के येही तो है मिज़ाज शियसत के चलो उठो फिर शहर में दंगा कर दे वो कौन हैं जिन्हें इन्शान का दर्जा दे वो लाश सी पड़ी जिन्दगी उसे शिज्दा दे वो कामगर जो वहाँ बैठा है वो चने वाला जो वहाँ सोया है चलो उठाओं मशाल सब धुआ-धुआ कर दें
बस यूं ही,..... कुछ खास नहीं बस यूं ही.... सुखद एहसास नहीं बस यूं ही... दिल की भड़ास नहीं बस यूं ही... कोई खास आवाज़ नहीं बस यूं ही... तेरे प्यार की किताब नहीं बस यूं ही... मैं तेरे पास नहीं बस यूं ही... कुछ बवाल नहीं बस यूं ही... जगती हुई कोई रात नहीं बस यूं ही......कहानियों की इतिहास नहीं बस यूं ही... कविताओं की प्यार नहीं बस यूं ही.... तेरे सवालों की जवाब नहीं बस यूं ही.... खैर छोड़ो ये दिल की दुकान नहीं बस यूं ही......