रात ये जब सो जाती है
राह बहुत थक जाती है
गाँव के पीछे जंगल मे आकर
जब सीयार हुंआई लेता है
तब घर की दुलहन चौखट पर
आकर
प्रीतम के आने की उम्मिद
जगाती है।
लल्ला जब ख़्वाब लिये सो
जाता है
सास-ससुर की आहट भी आँख तले
थक जाती है
छत के उपर आसमान में आकर
जब चँदा आँख लड़ाता है
तब घर की दुलहन चौखट पर
आकर
प्रीतम के आने की उम्मिद
जगाती है।
दर्पण ये जब सो जाती है
बिस्तर अंगड़ाई खा-खा कर थक
जाती है
भाभी-भाभी कहकर
जब कोई दिल्लगी कर जाता है
तब घर की दुलहन चौखट पर
आकर
प्रीतम के आने की उम्मिद
जगाती है।
सिन्दुर ये जब सो जाती है
चूड़ी की खन-खन भी जब हाथ
में थक जाती है
जब दूजा ब्याह रचाने को सास-ससुर समझाते आकर
और फिर,ऐसे में रिस्ते की बात कोई नया कर
जाता है
तब घर की दुलहन चौखट पर
आकर
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