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वह अविनाशी है !


जो अगाध प्रेम की प्रतिमूरत है,
उसको कहते माँ हैं।
उसने प्रथम स्पर्श किया तब,
जब मैं केवल एक भ्रूण मात्र था।
आज पृथ्वी पर जन्म लिया,
 मानवता का भेष धरा
तब जाकर उसने कई रात जगी कर  
माँ का एक-एक धर्मा किया पूरा।
                            जिसका ऋणी हुआ है मानव,
उसको कहते माँ हैं।
इक ऋण अदा हो जाये तो परम पूरुष तुम कहलाओ
धर्म तुम्हारा भी है रात जगो बेटे का धर्म करो पूरा।
जिसके ऋणी हुए हो तुम,
 उस माँ पर बलि-बलि तुम जाओ।
देखो आंचल इधर उधर जो बिखरा-बिखरा है,
उसको हाथ समेटो
माँ को पलको तक लाओ
उससे प्रेम अगाध करो।
जो अजर-अमर है जिसका केवल शरीर मरेगा,
उसको कहते माँ है  

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