मैं एक पहाड़ी नदी हूँ पहाड़ो से उतर पठारों पे चलती हूँ कभी शांत तो कभी बादल की शोर में होती हूँ अपने ही पैरों मे थकन ले जमी तृप्त करती हूँ मैं एक पहाड़ी नदी हूँ पहाड़ो से उतर पठारों पे चलती हूँ कभी गृष्म में तपती हूँ कभी हेमन्त में कांपती हूँ पानी की ढेर लेकर कभी जलपल्वित भी होती हूँ मैं एक पहाड़ी नदी हूँ पहाड़ो से उतर पठारों पे चलती हूँ कहीं गाँव बसाती हूँ कहीं जंगल उगाती हूँ दूर-देश चलकर नई सभ...
बस यूं ही,..... कुछ खास नहीं बस यूं ही.... सुखद एहसास नहीं बस यूं ही... दिल की भड़ास नहीं बस यूं ही... कोई खास आवाज़ नहीं बस यूं ही... तेरे प्यार की किताब नहीं बस यूं ही... मैं तेरे पास नहीं बस यूं ही... कुछ बवाल नहीं बस यूं ही... जगती हुई कोई रात नहीं बस यूं ही......कहानियों की इतिहास नहीं बस यूं ही... कविताओं की प्यार नहीं बस यूं ही.... तेरे सवालों की जवाब नहीं बस यूं ही.... खैर छोड़ो ये दिल की दुकान नहीं बस यूं ही......

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